09 July, 2016

संजय बांगड़ के साथ नॉकिंग



संजय बांगड़ भारतीय क्रिकेट टीम के प्रॉपर कोच बनाये गये हैं। बांगड़ मेरे लिए पहले अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर रहे हैं जिनको मैंने बॉलिंग की है। उन दिनों बांगड़ रेलवे का मैच खेलने पटना आये हुए थे। ऑफ सीजन था इसलिए हमलोग सिर्फ फिटनेस के लिए स्टेडियम आते थे। हमारी एकेडमी से स्टेडियम का एंट्रेंस दूर था इसलिए हम सीआरपीएफ वाले गेट से अंदर जाते थे वो भी जाली कूद कर। मैं जरा पहले आ गया उस दिन। अंदर आकर देखा तो मेरे अलावा एक कौवा भी नहीं है स्टेडियम में। बस एक प्लेयर अकेले शैडो कर रहा है। (शैडो एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें अकेले बैट लेकर बल्लेबाजी करने का अनुभव किया जाता है।)

क्रिकेटरों को किसी के बैट चलाने मात्र से उसके स्तर का पता चल जाता है। मैं समझ गया विशेष मामला है। जाली कूदकर अंदर मैदान में गया तो देखा संजय बांगड़। एक हाथ में बॉल दूसरे में बैट और कान पर मोबाइल। मैं चुपचाप खड़ा होकर फिलिंग लेने लगा। मैं नींद में था और सपना देख रहा था। बांगड़ ने इशारे से कहा बॉलिंग करो क्योंकि मैं क्रिकेट की ड्रेस में था। उन्हें कौन बताए कि मैं बॉलर नहीं विकेटकीपर हूँ।


संजय बांगड़
फिर भी इतना सबको आता है। इस हल्की प्रैक्टिस बॉलिंग को नॉकिंग कराना कहा जाता है जो बहुत कठिन काम है जिसमें सिर्फ ओवरपिच बॉल करानी होती है। मैंने एक दो बार स्पिन कराके चकमा देने की कोशिश की लेकिन बांगड़ चालू आदमी निकला। हँस कर डेड डिफेंस कर दिया। नॉकिंग के बाद उन्होंने पास बुलाया और वही सब पूछा जो एक सीनियर क्रिकेट जूनियर से पूछता है। मैंने बस इतना ही कहा कि मुझे अपना बैट छूने दीजिए। उन्होंने हंसते हुए कहा ले ही जाओ। आज वो कोच बने हैं अपना टाइप फील हो रहा है। संजय बांगड़ और भारतीय टीम को शुभकामनाएँ।

फाइटर कुंबले


फाइटर कुंबले

अनिल कुंबले को भारतीय क्रिकेट टीम का नया कोच बनाया गया है।

उनको रवि शास्त्री, संदीप पाटिल, वेंकटेश प्रसाद, प्रवीण आमरे, स्टुअर्ट ला जैसे 57 दिग्गजों पर वरीयता दी गयी है। कुंबले को सबसे पहले एक चश्मिश गेंदबाज के रूप में हमने देखा था।

उसके बाद जब उसने फिरोजशाह कोटला में पाकिस्तान के विरुद्ध टेस्ट क्रिकेट में पूरे 10 विकेट लिए तो बंदा हमारी नजर में आ गया। पढाई- लिखाई के चक्कर में हम वो मैच नहीं देख पाये थे लेकिन उस खबर को अच्छे से पढना चाहते थे। एकमात्र उपाय था क्रिकेट सम्राट। मम्मी ने पैसे देने से इंकार कर दिया और पापा से आज भी उम्मीद कम ही है। ममेरे भाई को कनविंस किया। उनको बताया कि अगर ये वाला क्रिकेट सम्राट आपने नहीं खरीदा तो बहुत कुछ मिस कर देंगे आप। वो खुद क्रिकेट के फैन थे।

प्रशांत सिनेमा के सामने एक विविध समानों की दुकान थी, जिसमें क्रिकेट सम्राट भी मिलती थी। ममेरा भाई पैसे वाला था उसने खरीद लिया मेरे कहने पर। भैया मेरा हाथ थामे रहे और हम रोड पर बिना इधर-उधर देखे क्रिकेट सम्राट पढते रहे।

हम बच्चों की रुचि आमतौर पर बल्लेबाजी में होती है लेकिन उस दिन से मेरी रूचि गेंदबाजी में भी हो गयी। यह जिम लेकर के बाद एक नया रिकार्ड था जिसमें किसी भारतीय गेंदबाज ने टेस्ट की एक पारी में 10 विकेट लिए थे। कुंबले के बारे में हमें ये पता चल चुका था कि वे इंजीनियर भी हैं इससे हमारी हिम्मत भी बढ गयी थी।

जैसे ही कोई हमें सचिन के मैट्रिक फेल होने को लेकर हतोत्साहित करता हम तुरंत कुंबले को ला पटकते। लेकिन कुंबले हमारे लिए असली वाला हीरो और प्रेरणा स्रोत तब बने जब उन्होंने 2002 में वेस्टइंडीज के विरुद्ध एंटिगा में जबड़ा टूट जाने के बाद भी 14 ओवर की गेंदबाजी की और ब्रायन लारा का विकेट लिया। यह वही मैच था शायद जिसमें फरीदाबाद के अजय रात्रा ने किसी भी भारतीय विकेटकीपर बल्लेबाज की तरफ से वेस्टइंडीज की धरती पर पहला टेस्ट शतक बनाया थ। ऐसे फाइटर खिलाड़ी का कोच बनना भारतीय टीम के लिए सुखद है। एक मौका भी है कुंबले के लिए ताकि वे साबित करें कि देशी कोच भी भारतीय टीम को ऊंचाई पर ले जा सकते हैं। शुभकामनाएं।

29 August, 2013

सब खेलों का हो सम्मान


उन दिनों मैं पटना में बिहार क्रिकेट एसोसिएशन के एकेडेमी में प्रशिक्षु था | जब कभी खजांची रोड जाना होता तो मेरी नजर बार-बार एक चाय के दुकान पर टिक जाती | या यों कहें की जब मैं उस दुकान के करीब पहुँचने वाला होता तभी से मेरे मन में हलचल मच जाती | वैसे तो वह साधारण चाय की दुकान थी लेकिन इन मायनो में खास थी की उसका मालिक एक राष्ट्रीय खिलाड़ी था | इसकी सूचना दुकान के पीछे लगा एक बोर्ड देता था | ठीक से तो याद नहीं पर शायद वह कबड्डी या तैराकी का खिलाड़ी था |


जब कभी अपने दोस्तों से इसकी चर्चा करता तो सब  मजाक उड़ाते हुए कहते एक दिन तुझे भी इसी तरह पान की दुकान खोलनी पड़ेगी | मुझे यह सब तब सुनना पड़ता था जब क्रिकेट इस देश में सबसे लोकप्रिय था और इसमें कैरियर की संभावना अन्य खेलों से ज्यादा थी | जो कोई भी उस बोर्ड पर लिखे अक्षरों को पढ़ता होगा और उसने नीचे खेल के दिनों की एकमात्र कमाई फुर्तीसे चाय देते उस राष्ट्रीय खिलाड़ी को देखता होगा तो कभी नहीं सोचता होगा कि अपने बच्चों को खिलाड़ी बनाया जाय | वैसे भी खजांची रोड किताबों और स्टेशनरी की दुकान के लिए प्रसिद्ध है | कुल मिलाकर उस जगह पर आपको हर वक़्त वही पुरानी कहावत की ज्यादा सार्थक लगती है कि पढोगे लिखोगे तो बनोगे नबाव, खेलोगे कूदोगे तो बनोगे ख़राब’ |
एक बार इसी तरह ट्रेन में एक आदमी से मुलाकात हुई | खिलाड़ी के ड्रेस में किट के साथ देखकर वह समझ गया कि मैं खिलाड़ी हूँ | उसने मुझसे खेल के बारे इतनी बात की कि मेरे पास बताने को कुछ नही रह गया | दरअसल उसकी दो बेटियां तैराकी की खिलाड़ी थी और वह जानना चाहता था कि उसे कैसे आगे बढाया जाय ? मैं चाह कर भी उसकी मदद लायक कुछ बता नहीं पाया | बातचीत में ही उसने बताया कि उनकी दोनों बेटियां नदी में तैरने का अभ्यास करती है | मैंने पूछा भी कि जब समाज में लड़कों के खेलने को लेकर मजाक बनाया जाता है तो भी आपने बेटियों को इसकी इजाजत कैसे दे दी ? उन्होंने इसका सीधा जबाब नहीं देकर अपनी संघर्ष की  कहानी सुनानी शुरू कर दी | 

मुझे उनके जूनून को सुनकर लग गया कि अगर किसी खिलाड़ी के पास ऐसे पिता हों तो उनको और किसी से क्या लेना | आज मुझे पता नहीं उनका क्या हुआ उनकी बेटियां कहाँ तक पहुंची | लेकिन अगर खेल को लेकर हमारे समाज में सकारात्मक माहौल होता तो निश्चित तौर पर आज हमें पता होता कि वह कहाँ है | अगर आप क्रिकेट के स्तरीय खिलाड़ी हैं तो कम से कम आप अपने शहर के चर्चित चेहरे होते हैं लेकिन अगर आप कम लोकप्रिय खेल के राष्ट्रीय या अन्तर्राष्ट्रीय खिलाड़ी भी है तो आपको अपने एसोसिएशन और परिवार के बाहर बहुत कम लोग जानते हैं | वैसे पिछले कई सालों से स्थितियां बदली है सानिया मिर्जा, सायना नेहवाल, अभिनव बिंद्रा, सुशील कुमार, मैरिकोम जैसे खिलाडियों ने खुद को साबित भी किया और मीडिया ने उनको हाथों हाथ लिया भी | 

क्रिकेट ने इस देश में जो लोकप्रियता हासिल की है उसमें पूंजीवाद से लेकर मीडिया तक तमाम चीज का हाथ जरुर है परन्तु हमें यह भी याद रखना चाहिए की क्रिकेट से पहले हॉकी इस देश में छाया हुआ था और उसने अपने प्रदर्शन के बल पर उसका स्थान ले लिया | 1982 के हॉकी एशियाड में पाकिस्तान के हाथों मिली हार ने खेल प्रेमियों का दिल तोड़ दिया परन्तु कपिल ने 1983 में क्रिकेट का विश्व कप दिला कर पूरे देश को क्रिकेट का दीवाना बना दिया | तभी से क्रिकेट को लेकर जो दीवानापन इस देश में पैदा हुआ वो तमाम विवादों से भी ख़तम होता नहीं दिख रहा है | जाहिर है कि पहले तमाम खेलों के खिलाडियों को साबित करना होगा की वो भी देश के लिए पदक ला सकते हैं | ऊपर जिन खिलाडियों का मैंने नाम लिया उन सब ने पहले अपने प्रदर्शन से उम्मीद जगाई तब जाकर पूरे देश ने उनको पलकों पर बिठाया | 

खेल दिवस के अवसर पर जब देश में खेल की स्थिति पर मैं सोच रहा था तो मुझे बार-बार लग रहा था कि वह दिन कब आएगा जब हम ओलंपिक जैसी प्रतियोगिता में सम्मानजनक स्थान हासिल करेंगे ? इस वक़्त हमारा देश आंतरिक रूप से ही इतना जूझ रहा है कि यहाँ खेल के लिए माहौल बनने में समय लगेगा | आज भी प्रतिस्पर्धी खेल में देश का बड़ा हिस्सा कटा हुआ है उनके लिए खलने की उम्र तय है और वह भी स्वास्थ्य की दृष्टि से | जरुरत इस बात की है कि सरकारी स्तर पर इसके लिए पहल लगातार होती रहे और उनके भविष्य की चिंता सरकार करे ताकि वो निश्चित होकर खेल पर ध्यान लगा सके | जनता के रूचि अनुसार कोई ना कोई खेल तो अपने समय में सबसे अधिक लोकप्रिय होगा इससे हम मुंह नहीं मोड़ सकते | आज किसी खेल का खिलाड़ी अपने राज्य का सबसे बड़ा करदाता है और दूसरे खेल का खिलाड़ी इतना कमा ही नहीं पाता कि कर दे सके, ऐसी स्थिति से निपटा जा सकता है | दस देशों के बीच खेले जाने वाले क्रिकेट में अपने को हम भले ही तीसमार खां समझते हों परन्तु अन्य खेलों पर ध्यान देकर ही हम ओलंपिक या अन्य अन्तर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में अपने को साबित कर वैश्विक फलक पर अपनी पहचान बना सकते हैं |

31 January, 2013

कुछ तुम खेलो कुछ हम खेलें

आज भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने वेस्टइंडीज महिला क्रिकेट को वर्ल्ड कप के पहले मैच में बुरी तरह धो दिया | कामनी ने शतक जमाया तो झूलन गोस्वामी ने धारदार गेंदबाजी की | यह जानकर आश्चर्य लगता है कि महिलाओं का विश्वकप 1973 में शुरू हुआ जबकि पुरुषों का 1975 में | लेकिन आज भी महिलाओं के क्रिकेट को ना तो दर्शक मिलते हैं ना ही ढंग के प्रायोजक | क्रिकेट में महिलाओं को और आगे लाने के लिये क्यूँ ना पुरुषों के क्रिकेट में सिर्फ दो महिलाओं को खेलने का मौका दिया जाय | क्रिकेट में ही क्यूँ और भी खेल में | इससे ये होगा कि खेल का तो आकर्षण बढ़ेगा ही साथ ही साथ लड़कियों को भी अपनी क्षमता बढ़ाने का मौका मिलेगा |  खेल के बाहर की लड़कियों में तो हर कोई रूचि लेता है पर जब वो खेल के मैदान में होती है तो शायद हमको लगता है कि ये लड़कियां क्या खेलेंगी ? वास्तव में खेल अपनी मूल प्रकृति में पुरुषवादी ही है जहाँ महिलाओं का प्रवेश उसके जिजीविषा का  ही परिणाम है | जहाँ ताकत का प्रदर्शन हो जहाँ युद्द का वातावरण हो उस मैदान में  लड़कियों का आगमन साबित करता है कि उन्हें भी बस मौके की जरुरत है | झूलन गोस्वामी की स्पीड अपने इरफ़ान पठान के ही आसपास है | उसे गेंदबाजी करते देखते हुए लगता है कि अगर उसे पुरुषों की टीम में रखा जाय तो पठान से तो बढ़िया बोलिंग  कर ही लेगी | शुरू में भले ही ये बहुत सफल कदम ना हो पर ऐसा करना क्रिकेट और आकर्षक बना देगा | गोस्वमी के कोच साधु जी कहते थे कि इस लड़की ने किसी लड़के से किसी में मायने में कम मेहनत नहीं किया है |  मैदान तक आने में 2-3 घंटे का सफर और फिर जाने में भी वही सब कुछ | जब आम जिंदगी में महिलाएं पुरुषों से कदमताल कर रही है तो खेल में अलगाव क्यूँ ?

25 December, 2012

बल्लेवादी क्रिकेट

इशांत शर्मा की एक  उठती और बाहर जाती बॉल को नो बॉल दिया गया जिस पर दामाद जी आउट थे | नियम के अनुसार तो वे आउट थे पर यह नियम बल्लेवादी है | जिस तरह हमारे यहाँ पितृसत्तात्मक समाज है और अधिकतर नियम कानून उसकी सत्ता को बचाए रखने के लिये है उसी तरह क्रिकेट में भी सारे नियम कानून बल्लेबाजों के हित में है | क्रिकेट नाम के खेल की शुरुआत ही मालिक और गुलाम के बीच हुआ | मालिक का काम बेटिंग करना था  और गुलामों का काम गेंद फेंकना और गेंद बिछना |  मालिक ( बल्लेबाजों ) को गेंद पीटने में कोई असुविधा ना हो  इस कारण नियम उसी के अनुसार बना दिये गये | पहले पिच पर कवर नहीं लगाये जाते थे ,हेलमेट नहीं था ,मेडिकल की तुरंत फुरंत सविधा नहीं थी ,  वीडियो  तकनीक का सहयोग नहीं था और गेंदबाज बिना मिलावट का खाना खा कर जी जान से बॉल फेंकता था | तब के लिये तो मान लिया कि नियम को बल्लेबाजों के हित में  जरुरी था पर अब डर काहे का | आज तो IPL खेल कर उनको ऐसा चस्का लग गया है कि धुनिया कि तरह गोलंदाजों को धोया जा रहा है | जिस गेंद पर मलिक को आउट नहीं दिया गया उस गेंद ने ऐसा कोई डर पैदा नहीं किया जिससे उन्हें शॉट खेलने में कोई दिक्कत हुई हो | ऐसे बॉल पर सचिन और सहवाग अपर कट करके छक्का मारते रहें हैं | होना यह चाहिए कि ऐसे गेंद को नो बॉल देना चाहिए जो वाकई बल्लेबाजों के शरीर को प्रभावित करे और उन्हें शॉट खेलने में दिक्कत पैदा करे |ICC को चाहिए कि वो पहल कर क्रिकेट को सिर्फ बेट्समैन का खेल बनने से रोकें ताकि खेल का रोमांच बना रहे | आज के मैच का यह निर्णायक बिंदु था ,अगर तब मलिक आउट होते तो अंतिम ओवर में 10 रन बनाना इतना आसान नहीं होता |

23 December, 2012

तुम याद आओगे सचिन .........

पुलिसिया दमन के दुखद क्षणों के  बीच सचिन का एकदिनी से जाना भी मेरे लिये कम दुखद नहीं रहा | वैसे सचिन को राज्यसभा का सदस्य बनाने और  उनके सन्यास लेने के समय की जो परिस्थितियाँ देश में रही उस आधार पर इस फैसले के पीछे किसी खास समझौते से इंकार नहीं किया जा सकता | सचिन मूल रूप में एक खिलाड़ी रहा है और अगर हम उसको परखने में उसके खेल की और ध्यान लगायें तो इतना कह सकते है कि आने वाले समय में हम गर्व से कह सकेंगे कि हम सचिन को खेलते देख बड़े हुए हैं | गाँधी के बारे में जिस तरह कहा गया कि आने वाली पीढ़ी शायद ही विश्वास करे कि इस धरती पर हाड़ - मांस का कोई एक प्राणी हुआ था उसी तरह सचिन के बारे में जब कुछ कहा सुना जायेगा तो लोग आह भरेंगे |  प्रख्यात खेलनवीस प्रभाष जोशी ने 25 अगस्त 2002 को जनसत्ता में लिखा " किसी को अंतिम रूप से महान स्वीकार करने से पहले दुनिया उसे कीचड़ में लथेड़ने की पूरी कोशिश करती है | " सचिन के साथ आज दिन भर फसबुक पर ऐसा होता रहा तो क्या नया ? मैं सचिन के टेस्ट क्रिकेट से जाने कि उम्मीद तो जरुर लगा रहा था पर ODI से कतई नहीं | भाई उन्होंने अपनी पिछली दो  ODI पारियां विदेशी धरती पर खेलते हुए क्रमशः 114 और 52 रन बनाये | टेस्ट में मैं  गावस्कर , लारा ,पोंटिंग ,कैलिस ,द्रविड़ को सचिन से ऊपर मानता हूँ | वैसे आँकड़े मुझे ऐसा कहने कि इजाजत नहीं दे रहे पर मैं क्रिकेट के तमाम पहलुओं पर गौर करते हुए ऐसा कह रहा हूँ | इसी के बरक्स मुझे ऐसा कोई खिलाड़ी नजर नहीं आता जो एक दिनी में सचिन से कंधा जुड़ा सके | इस पोस्ट को लिखते हुए मुझे तमाम वो घटनाएँ याद आ रही है जिसको मैंने  पत्रिकाओं और समाचार पत्रों से काट कर डायरी में चिपकाये टुकडों में प्रतियोगिता परीक्षा के माफिक सैकडों बार पढ़ा है | सचिन जैसा अपने कर्म के प्रति समर्पित योद्धा सदियों में कम पैदा होता है | आज जब युवा पीढ़ी चकाचौंध के बीच अपने मूल्यों के फिसल रही है क्या वहाँ  सचिन को उदाहरण के तौर पेश नहीं किया जा सकता | खेल की दुनिया में एक से एक महान खिलाड़ी हुए ,खूब प्रसिद्धि भी पायी पर कम लोग उसे  सचिन के तरह पचा पाए | मैं सचिन को भगवान तो नहीं मानता पर  अंत में इतना इतना जरुर कहूँगा कि सचिन भी  जादूगर थे ध्यानचंद ,पेले की तरह |

18 December, 2012

कल मुझे एक पुरस्कार वितरण समारोह में जाने का मौका मिला ,जहाँ कुछ बातें मन में उभरी | पहले कुछ तथ्यात्मक सूचना,फिर अपने विचार |
                                          संवेद फाउण्डेशन’ की ओर  पहला ‘पीयूष किशन युवा पुरस्कार’ युवा सामाजिक कार्यकर्ता रामाशंकर कुशवाह को J.N.U में हुए एक कार्यक्रम में दिया गया | कुशवाहा जी दिल्ली विश्वविद्यालय और उसके आसपास के इलाकों कई वर्षों से पूरे मनोयोग  मजदूरों के बच्चों के बीच शिक्षा का अलख जगा रहे हैं | यह पुरस्कार 'संवेद' और 'सबलोग ' पत्रिका के संपादक किशन कालजयी के दिवंगत पुत्र पीयूष किशन कि स्मृति में हर वर्ष दिया जायेगा | किशन जी ने इसकी सूचना देते हुए फेसबुक पर लिखा "यह पुरस्कार युवा खिलाड़ी,कलाकार और प्रबन्ध शास्त्र के मेधावी छात्र पीयूष किशन की स्मृति में हर वर्ष एक ऐसे सम्भावनाशील युवा प्रतिभा को देने का निर्णय लिया गया है जो जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हुए समाज के विविध क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण योगदान कर रहे हैं।" पीयूष एक अच्छा क्रिकेटर था | मुझे भी उसके साथ खेलने का मौका मिला था | उसकी स्मृति में इस पुरस्कार का स्वागत |
                 यह पुरस्कार एक क्रिकेट खिलाड़ी कि याद में शुरू किया गया है इसलिए मुझे लगता है कि खेल से जुड़े शख्सियतों को भी यह सम्मान मिलना चाहिए | खेल की बड़ी हस्तियाँ तो सम्मान पा जाती हैं  पर बहुत से ऐसे शख्स भी हैं जो खेल के मैदान में अपनी सारी उर्जा खर्च करने के बाबजूद गुमनाम रह जाते हैं | कुछ गुदरी के लाल मौके और प्रोत्साहन  के इंतजार में रहते हैं तो कुछ कोच चुपचाप युवा पीढ़ी की  उर्जा का सकारात्मक उपयोग करके उनको भटकने से रोकते हैं | कठिन होते समय में खेल हमें जीवन से लड़ना और जीतना सिखाता है इसलिए खेल से जुड़े युवाओं को भी प्रोत्साहित किये जाने की जरुरत है ताकि एक स्वस्थ और उर्जावान पीढ़ी का निर्माण लगातर चलता रहे |