29 August, 2013

सब खेलों का हो सम्मान


उन दिनों मैं पटना में बिहार क्रिकेट एसोसिएशन के एकेडेमी में प्रशिक्षु था | जब कभी खजांची रोड जाना होता तो मेरी नजर बार-बार एक चाय के दुकान पर टिक जाती | या यों कहें की जब मैं उस दुकान के करीब पहुँचने वाला होता तभी से मेरे मन में हलचल मच जाती | वैसे तो वह साधारण चाय की दुकान थी लेकिन इन मायनो में खास थी की उसका मालिक एक राष्ट्रीय खिलाड़ी था | इसकी सूचना दुकान के पीछे लगा एक बोर्ड देता था | ठीक से तो याद नहीं पर शायद वह कबड्डी या तैराकी का खिलाड़ी था |


जब कभी अपने दोस्तों से इसकी चर्चा करता तो सब  मजाक उड़ाते हुए कहते एक दिन तुझे भी इसी तरह पान की दुकान खोलनी पड़ेगी | मुझे यह सब तब सुनना पड़ता था जब क्रिकेट इस देश में सबसे लोकप्रिय था और इसमें कैरियर की संभावना अन्य खेलों से ज्यादा थी | जो कोई भी उस बोर्ड पर लिखे अक्षरों को पढ़ता होगा और उसने नीचे खेल के दिनों की एकमात्र कमाई फुर्तीसे चाय देते उस राष्ट्रीय खिलाड़ी को देखता होगा तो कभी नहीं सोचता होगा कि अपने बच्चों को खिलाड़ी बनाया जाय | वैसे भी खजांची रोड किताबों और स्टेशनरी की दुकान के लिए प्रसिद्ध है | कुल मिलाकर उस जगह पर आपको हर वक़्त वही पुरानी कहावत की ज्यादा सार्थक लगती है कि पढोगे लिखोगे तो बनोगे नबाव, खेलोगे कूदोगे तो बनोगे ख़राब’ |
एक बार इसी तरह ट्रेन में एक आदमी से मुलाकात हुई | खिलाड़ी के ड्रेस में किट के साथ देखकर वह समझ गया कि मैं खिलाड़ी हूँ | उसने मुझसे खेल के बारे इतनी बात की कि मेरे पास बताने को कुछ नही रह गया | दरअसल उसकी दो बेटियां तैराकी की खिलाड़ी थी और वह जानना चाहता था कि उसे कैसे आगे बढाया जाय ? मैं चाह कर भी उसकी मदद लायक कुछ बता नहीं पाया | बातचीत में ही उसने बताया कि उनकी दोनों बेटियां नदी में तैरने का अभ्यास करती है | मैंने पूछा भी कि जब समाज में लड़कों के खेलने को लेकर मजाक बनाया जाता है तो भी आपने बेटियों को इसकी इजाजत कैसे दे दी ? उन्होंने इसका सीधा जबाब नहीं देकर अपनी संघर्ष की  कहानी सुनानी शुरू कर दी | 

मुझे उनके जूनून को सुनकर लग गया कि अगर किसी खिलाड़ी के पास ऐसे पिता हों तो उनको और किसी से क्या लेना | आज मुझे पता नहीं उनका क्या हुआ उनकी बेटियां कहाँ तक पहुंची | लेकिन अगर खेल को लेकर हमारे समाज में सकारात्मक माहौल होता तो निश्चित तौर पर आज हमें पता होता कि वह कहाँ है | अगर आप क्रिकेट के स्तरीय खिलाड़ी हैं तो कम से कम आप अपने शहर के चर्चित चेहरे होते हैं लेकिन अगर आप कम लोकप्रिय खेल के राष्ट्रीय या अन्तर्राष्ट्रीय खिलाड़ी भी है तो आपको अपने एसोसिएशन और परिवार के बाहर बहुत कम लोग जानते हैं | वैसे पिछले कई सालों से स्थितियां बदली है सानिया मिर्जा, सायना नेहवाल, अभिनव बिंद्रा, सुशील कुमार, मैरिकोम जैसे खिलाडियों ने खुद को साबित भी किया और मीडिया ने उनको हाथों हाथ लिया भी | 

क्रिकेट ने इस देश में जो लोकप्रियता हासिल की है उसमें पूंजीवाद से लेकर मीडिया तक तमाम चीज का हाथ जरुर है परन्तु हमें यह भी याद रखना चाहिए की क्रिकेट से पहले हॉकी इस देश में छाया हुआ था और उसने अपने प्रदर्शन के बल पर उसका स्थान ले लिया | 1982 के हॉकी एशियाड में पाकिस्तान के हाथों मिली हार ने खेल प्रेमियों का दिल तोड़ दिया परन्तु कपिल ने 1983 में क्रिकेट का विश्व कप दिला कर पूरे देश को क्रिकेट का दीवाना बना दिया | तभी से क्रिकेट को लेकर जो दीवानापन इस देश में पैदा हुआ वो तमाम विवादों से भी ख़तम होता नहीं दिख रहा है | जाहिर है कि पहले तमाम खेलों के खिलाडियों को साबित करना होगा की वो भी देश के लिए पदक ला सकते हैं | ऊपर जिन खिलाडियों का मैंने नाम लिया उन सब ने पहले अपने प्रदर्शन से उम्मीद जगाई तब जाकर पूरे देश ने उनको पलकों पर बिठाया | 

खेल दिवस के अवसर पर जब देश में खेल की स्थिति पर मैं सोच रहा था तो मुझे बार-बार लग रहा था कि वह दिन कब आएगा जब हम ओलंपिक जैसी प्रतियोगिता में सम्मानजनक स्थान हासिल करेंगे ? इस वक़्त हमारा देश आंतरिक रूप से ही इतना जूझ रहा है कि यहाँ खेल के लिए माहौल बनने में समय लगेगा | आज भी प्रतिस्पर्धी खेल में देश का बड़ा हिस्सा कटा हुआ है उनके लिए खलने की उम्र तय है और वह भी स्वास्थ्य की दृष्टि से | जरुरत इस बात की है कि सरकारी स्तर पर इसके लिए पहल लगातार होती रहे और उनके भविष्य की चिंता सरकार करे ताकि वो निश्चित होकर खेल पर ध्यान लगा सके | जनता के रूचि अनुसार कोई ना कोई खेल तो अपने समय में सबसे अधिक लोकप्रिय होगा इससे हम मुंह नहीं मोड़ सकते | आज किसी खेल का खिलाड़ी अपने राज्य का सबसे बड़ा करदाता है और दूसरे खेल का खिलाड़ी इतना कमा ही नहीं पाता कि कर दे सके, ऐसी स्थिति से निपटा जा सकता है | दस देशों के बीच खेले जाने वाले क्रिकेट में अपने को हम भले ही तीसमार खां समझते हों परन्तु अन्य खेलों पर ध्यान देकर ही हम ओलंपिक या अन्य अन्तर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में अपने को साबित कर वैश्विक फलक पर अपनी पहचान बना सकते हैं |