31 January, 2013

कुछ तुम खेलो कुछ हम खेलें

आज भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने वेस्टइंडीज महिला क्रिकेट को वर्ल्ड कप के पहले मैच में बुरी तरह धो दिया | कामनी ने शतक जमाया तो झूलन गोस्वामी ने धारदार गेंदबाजी की | यह जानकर आश्चर्य लगता है कि महिलाओं का विश्वकप 1973 में शुरू हुआ जबकि पुरुषों का 1975 में | लेकिन आज भी महिलाओं के क्रिकेट को ना तो दर्शक मिलते हैं ना ही ढंग के प्रायोजक | क्रिकेट में महिलाओं को और आगे लाने के लिये क्यूँ ना पुरुषों के क्रिकेट में सिर्फ दो महिलाओं को खेलने का मौका दिया जाय | क्रिकेट में ही क्यूँ और भी खेल में | इससे ये होगा कि खेल का तो आकर्षण बढ़ेगा ही साथ ही साथ लड़कियों को भी अपनी क्षमता बढ़ाने का मौका मिलेगा |  खेल के बाहर की लड़कियों में तो हर कोई रूचि लेता है पर जब वो खेल के मैदान में होती है तो शायद हमको लगता है कि ये लड़कियां क्या खेलेंगी ? वास्तव में खेल अपनी मूल प्रकृति में पुरुषवादी ही है जहाँ महिलाओं का प्रवेश उसके जिजीविषा का  ही परिणाम है | जहाँ ताकत का प्रदर्शन हो जहाँ युद्द का वातावरण हो उस मैदान में  लड़कियों का आगमन साबित करता है कि उन्हें भी बस मौके की जरुरत है | झूलन गोस्वामी की स्पीड अपने इरफ़ान पठान के ही आसपास है | उसे गेंदबाजी करते देखते हुए लगता है कि अगर उसे पुरुषों की टीम में रखा जाय तो पठान से तो बढ़िया बोलिंग  कर ही लेगी | शुरू में भले ही ये बहुत सफल कदम ना हो पर ऐसा करना क्रिकेट और आकर्षक बना देगा | गोस्वमी के कोच साधु जी कहते थे कि इस लड़की ने किसी लड़के से किसी में मायने में कम मेहनत नहीं किया है |  मैदान तक आने में 2-3 घंटे का सफर और फिर जाने में भी वही सब कुछ | जब आम जिंदगी में महिलाएं पुरुषों से कदमताल कर रही है तो खेल में अलगाव क्यूँ ?